ऐ इंसान तूने गज़ब कर दिया,
फूलों का भी मज़हब तै कर दिया !
गुलफाम बन के हम,
गुलिस्तां से लाए थे एक फूल,
महबूबा के लिए ले लाल,
दोस्त के लिए पिला,
अपने लिए सफ़ैद,
और काले को तूने शमशान कर दिया!
ऐ इंसान तूने तो गज़ब कर दिया....
हिन्द-ऐ-गुलिस्तां में फूल न खिले थे कभी
पेड़ों की बिसात पूछ कर,
पर जब उगे तो तूने उनमे भी रंग भेद कर दिया!
ऐ इंसान तूने तो गज़ब कर दिया...
रंग लाल हुआ तो हिन्दू,
हरे को इस्लाम कर दिया,
फूलों कि क्या औकात ही थी बगावती कसीदे पढ़ने की,
तूने तो हम सब का भगवान ही अलग कर दिया!
ऐ इंसान तूने गज़ब कर दिया,
फूलों का भी मज़हब तूने तै कर दिया !!
सुमित द्विवेदी
14 अप्रैल 2017
नई दिल्ली !
Comments
Post a Comment